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भगवान द्वारा ली गई हर परीक्षा सिर्फ मनुष्य की प्रगति के लिए होती है और ईश्वर इस परीक्षा को खुद लेते है

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भगवान द्वारा ली गई हर परीक्षा सिर्फ मनुष्य की प्रगति के लिए होती है और ईश्वर इस परीक्षा को खुद लेते है
सप्तम दिवस पर स्वदेश नगर लक्ष्मीनारायण धाम में  फूलों की होली खेली गयी

Bhopal: श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य महाराज  जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है" श्रवण कराया”।

महाराज जी ने आगे कहा की आज की कथा श्रवण करने से सातों दिन की कथा सुनने का लाभ प्राप्त होगा।

भगवान श्रीकृष्ण एकादश स्कंध में जब उद्धव भगवान से तमाम प्रश्न पूछते है ? उन तमाम प्रश्नो में भगवान ने एक बहुत प्यारी बात कही - संसार में अपराध कौन करता है, गलती कौन करता है, मनुष्य जीवन पाने के बाद भी अपनी मुक्ति से कौन भटकता है? 

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हम लोग अपराध कब करते है, पाप कब करते है, दोष कब प्रकट होते है? भगवान श्रीकृष्ण कहे रहे है जब मनुष्य का विवेक काम नहीं करता। जब मनुष्य ये नहीं सोचता की मैं कौन हूँ वो ये नहीं सोचता की मैं कहा से आया हूँ वो ये नहीं सोचता मैं क्यों आया हूँ वो ये नहीं सोचता ये जगत क्या है और यहाँ क्या हो रहा है। 

हम इस संसार में आये है आते ही संसार को अपना नहीं समझना चाहिए जब तक आप इस संसार को समझे बिना इसे अपना मान लेंगे तो सिवाए दुःख के कुछ नहीं मिलना। 

पहले कम से कम अपने विवेक का स्तेमाल करो की हमें इस संसार में आये है ये संसार क्या है हम किस लिए आये है यहाँ आने वाले लोग क्या कर रहे है और यहाँ आने का उद्देश्य क्या है ? 

तब हम कुछ भी समझ नहीं पाएंगे और उल्टा सीधा ही करने वाले है भगवान श्री कृष्ण कहते है मैंने इस ब्रह्माण्ड में बहुत रचनाएँ की है बड़ी सुन्दर रचनाएँ है इस संसार में एक पैर वाले है, दो पैर वाले है, तीन पैर वाले है, चार पैर वाले, अधिक पैर वाले है, बिना पैर वाले इत्यादि अनेक प्रकार की मैंने रचना की है अनेक प्रकार की सृष्टि मैंने बनाई है। 

इन सब मे मुझे जो सबसे ज्यादा प्रिय है वो है मनुष्य। कितनी बड़ी बात भगवान ने भागवत में एकादश सकन्ध में उद्धव से कही है। मनुष्य में ही वो क्षमता है की वो मुझे प्राप्त कर सकता है और 84 लाख योनि के चक्कर से बच सकता है और किसी योनि में ये क्षमता नहीं की बचा जा सके। भगवान द्वारा ली गई हर परीक्षा सिर्फ मनुष्य की प्रगति के लिए होती है और ईश्वर इस परीक्षा को खुद लेते है।  

महाराज जी ने आगे कहा की एक - एक पुण्य एकत्रित करके तब मनुष्य जीवन मिला है जब भगवान को तुम पर बहुत प्यार आता है तब भगवान करुणा करके तुम्हे मनुष्य जीवन दे देते है। ये जीव के प्रयास से मनुष्य जीवन नहीं मिल सकता हमारे प्रयासों से इस लायक नहीं है की हमें मनुष्य जीवन मिल जाये वो उनकी करुणा पर ही टिका हुआ है। जब वो करुणा करता है तब मनुष्य जीवन मिलता है।  

पूज्य श्री रमाकांत महाराज जी  ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था।

उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया।

उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट

करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया।

भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। 

परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक मेंसच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।