भारत छोड़ो आंदोलन के शहीद को असम सरकार ने दी श्रद्धांजलि

भारत छोड़ो आंदोलन के शहीद को असम सरकार ने दी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली: असम सरकार ने राज्य के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के घर का जीर्णोद्धार और संरक्षित करने का स्वागत योग्य कदम उठाया है। ये घर शहीद कुशल कोंवर का है। बता दें कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ऊपरी असम क्षेत्र में सैनिकों को ले जाने वाली अंग्रेजों की एक सैन्य ट्रेन को पटरी से उतार दिया गया था। इसमें कोंवर की भूमिका बताई गई।

ये वो दौर था जब 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन भी चरम पर था। ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने पर कुशल कोंवर को सजा-ए-मौत दे दी थी। 16 जून 1943 को भारत छोड़ो आंदोलन के अंतिम दौर में फांसी की सजा पाने वाले वे एकमात्र शहीद थे। इस बात के पीछे दावा किया जाता है कि उस आंदोलन के दौरान अपने प्राणों की आहुति देने वाले अधिकांश लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए थे।

इस मौके पर असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने मीडिया को बताया कि 'प्रदेश सरकार महान शहीद कुशाल कोंवर के घर का जीर्णोद्धार और संरक्षण करेगी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अत्यधिक उच्च देशभक्ति का प्रदर्शन किया था। कुशल कोंवर ने उन लोगों की जिम्मेदारी लेते हुए मौत की सजा स्वीकार करने का विकल्प चुना था, जिन्होंने वास्तव में सैन्य ट्रेन को पटरी से उतार दिया था।

उन्होंने कहा, "बाकी देश के लोगों और नई पीढ़ी को उन लोगों के बारे में बताया जाना चाहिए जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।"

कुशाल कोंवर के बारे में दावा किया जाता है कि वह भारत छोड़ो आंदोलन के एकमात्र शहीद थे जिन्हें फांसी दी गई थी। कोंवर 1942 में असम के वर्तमान गोलाघाट जिले में सरूपथर की स्थानीय कांग्रेस इकाई के सचिव थे। उन्होंने स्थानीय युवाओं के एक समूह की जिम्मेदारी ली थी, जिन्होंने उस क्षेत्र में रेलवे ट्रैक को तोड़ दिया था, जिसके चलते द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों को ऊपरी असम में ले जाने वाली एक विशेष ट्रेन के पटरी से उतर गई थी।

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