शारदीय नवरात्र आज से शुरू, जानें मैहर माता मंदिर का इतिहास, जहां मां ने भक्त को दिया था अमरता का वरदान

 शारदीय नवरात्र आज से शुरू, जानें मैहर माता मंदिर का इतिहास, जहां मां ने भक्त को दिया था अमरता का वरदान

मध्य प्रदेश : देशभर में आज से शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो रही है. मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक मध्य प्रदेश के सतना जिले में भी स्थित है. मैहर में पहाड़ों पर बसे इस शक्तिपीठ में हर नवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है, इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. आज भी सुबह 4 बजे माता की आरती हुई, इसमें लाखों श्रद्धालु पहुंचे. यहां जानें मैहर में बसे मां शारदा के मंदिर का पूरा इतिहास. 

हर साल लगता है मेला
मैहर में मां शारदा का मंदिर है, यहां हर साल शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि में मेला लगता है. देश-विदेश से मां के भक्त अपनी इच्छाएं लेकर मंदिर पहुंचते हैं. मां शारदा उन देवियों में से हैं, जिन्होंने कलयुग में भी अपने भक्त आल्हा की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे अमरता का वरदान दिया था. माना जाता है कि नवरात्रि में आज भी देवी मां की पहली पूजा आल्हा देव ही करते हैं. कोरोना महामारी के कारण यहां पिछले तीन मेले नहीं लग सके, लेकिन इस बार कोरोना प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए सभी भक्तों को मां के दिव्य दर्शन करने को मिलेंगे. 

विंध्य की पर्वत श्रेणियों में बसा है मंदिर
आदि शक्ति मां शारदा देवी का मंदिर मैहर नगर के पास विंध्य पर्वत श्रेणियों के बीच त्रिकूट पर्वत पर स्थित है. मां भवानी के 51 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर में मान्यता है कि यहां मां शारदा की पहली पूजा आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी. मैहर स्थित पर्वत का नाम प्राचीन धर्म ग्रंथों में भी मिलता है, इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ ही पुराणों में भी कई बार आया है. 

इस कारण बना शक्तिपीठ
माता के इस मंदिर तक जाने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है, हर दिन यहां हजारों श्रद्धालु आते हैं. मंदिर के बारे माना जाता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी. लेकिन राजा दक्ष को यह इच्छा मंजूर नहीं थी, बावजूद इसके माता सती ने जिद कर भगवान शिव से विवाह कर लिया. 

माता सती ने किया था देह त्याग
माता सती और भगवान शिव के विवाह के बाद राजा दक्ष ने एक यज्ञ करवाया, जिसमें उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया. भगवान शिव को नहीं बुलाया गया, यज्ञ स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित ना करने का कारण पूछा, इस पर राजा दक्ष ने भगवान शंकर को अपशब्द कह दिए. इस अपमान से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ अग्नि कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए.

सती के देह त्याग के बारे में भगवान शिव को पता चलते ही क्रोध में आकर उनका तीसरा नेत्र खुल गया. माना जाता है कि ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया. जहां भी सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ, माना जाता है कि सतना के पास माता सती का हार गिरा था, जिस कारण जगह का नाम 'माई का हार' पड़ गया. लेकिन अपभ्रंश होकर इसका नाम मैहर हो गया, इसी कारण इसे भी शक्तिपीठ माना गया. 

आल्हाखंड ने ढूंढ निकाला मंदिर
त्रिकूट पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है. देश-विदेश से पर्यटक यहां सिर्फ मां की एक झलक देखने के लिए पहुंचते हैं. मंदिर का ऐतिहासिक महत्व भी है, बताया जाता है कि आल्हाखंड के नायक दो सगे भाई आल्हा और उदल मां शारदा के अनन्य उपासक थे. आल्हा-उदल ने ही सबसे पहले जंगल के बीच मां शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी. 

मां ने दे दिया अमरता का आशीर्वाद
मंदिर की खोज के बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 साल तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया. भक्त की तपस्या से खुश होकर मां ने आल्हा को अमरता का वरदान दे दिया. मां शारदा के मंदिर प्रांगण में फूलमती माता का मंदिर आल्हा की कुल देवी का है. आस्था है कि हर दिन ब्रह्म मुहुर्त में खुद आल्हा द्वारा मां की पूजा-अर्चना की जाती है. 

मां के मंदिर की तलहटी में आज भी आल्हा देव के अवशेष हैं, उनकी तलवार और खड़ाऊ आम भक्तों के दर्शन के लिए रखी गई है. यहां आल्हा तालाब भी है, जिसे प्रशासन ने संरक्षित कर रखा है. सूचना बोर्ड में इस तालाब के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व का वर्णन किया गया है, यहां आल्हा-उदल अखाड़ा भी है. 

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